भरवाँ गज़ल –

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कई दिन हो गए मुझे ब्लॉग लिखते हुए … पहली बार कुछ लिखना शुरू किया था मैंने … पोस्ट करने के बाद हर बार मेरी नज़र ब्लॉग के स्टेटस पर जाती है … उत्सुकता होती है कि मुझे कितने लोगों ने पढ़ा … कल जब मेरे पाठक बहुत कम हो गए…ग्राफ सीधे नीचे गोता लगा गया था कल …. तो सोचा आज क्यों न कोई नयी और अनूठी रेसिपी पेश करूँ… कुछ मित्रों की शिकायत थी कि आप विधि तो बताती हैं पर कभी बना कर खिलाइये भी … तो आज पेश है आपको एक तैयार रेसिपी – स्वाद लें (पसंद आये तो आशीष भी दें)

भरवाँ गज़ल –

सामग्री-
1. केसरिया जज़्बात
2. प्यार की चाशनी
3. तीखी यादें
4. आंसुओं का नमक
5. एहसास की खुशबू
6. मिजाज़ का खट्टा
इन सब को मिला कर दिल हौले हौले भरें और गम की मद्धम आंच पर पकाएं … और ठंडा होने से पहले ही सर्व करें … (नोट- ये रेसिपी दिलजलों की बस्ती में बड़ी चाव से इस्तेमाल की जाती है….)
आप को नज़र है नोश फरमाएं—
तनहाइयों का सिलसिला ये कैसा है
गर वो मेरा है तो फासला ये कैसा है

तुम न आओगे कभी ये मै जानती हूँ
फिर तेरी यादो का काफिला ये कैसा है

कभी नाचती थी खुशियाँ मेरे आंगन में
अब उदासियों का मरहला ये कैसा है

देख लूँ उसको तो दिल को सुकूं आये
मुझे जान से प्यारा दिलजला ये कैसा है

एहसास हो जायेगा मेरे जज़्बात का तुझको
देख मेरी आँखों में ज़लज़ला ये कैसा है

न इश्क ही जीता और न दिल ही हारा
वफ़ा की राह में मेरा हौसला ये कैसा है

हौसला तुझमे भी नहीं है जुदा होने का
दूर हो कर भी भला मामला ये कैसा है
(ये मेरी पहली गज़ल है …. अगर पसंद आये तो हौसला दें)

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12 thoughts on “भरवाँ गज़ल –

    nirmla.kapila said:
    फ़रवरी 1, 2010 को 5:33 अपराह्न

    वाह पहली बार ब्लाग देखा बहुत अच्छा लगा। और आपकी दिश खा कर तो स्वाद आ गया बधाई और धन्यवाद्

    indu puri said:
    फ़रवरी 1, 2010 को 5:56 अपराह्न

    ”एहसास हो जायेगा मेरे जज़्बात का तुझको
    देखमेरी आँखों में ज़लज़ला ये कैसा है …..
    हौसला तुझमे भी नहीं है जुदा होने का
    दूर हो कर भी भला मामला ये कैसा है”
    तो ये आपकी ‘रेसिपी’ है
    मिठाई का लालच दे के ‘ऐसा’ खिलाया ?
    जैसे किसी बच्चे को मुंह में मिर्च दे दे कोई और वो………….
    केसरिया जज़्बात तो रेसिपी के रंग ने ही बता दिया,बहुत महंगी होती है ये केसर, किफायत से काम लो
    प्यार की चाशनी ……….? तुम्हारी रेसिपी में ? तुम दोनों पति पत्नी के पास इतनी है कि मुझ-सा डूबे तो जीवन भर उबर ही ना पाए.
    कम खिलाओ डायबिटिक तो बेचारा मर ही जाएगा .
    तीखी यादें ..मीठे में तीखे का क्या काम? गुजराती दिश थोड़े ही है ,सब में मीठा डाल दो?
    चलो हमे तो ये भी मंजूर पर भाई तुमने तो मीठी में तीखा डाल दिया वो भी यादों का
    ये ना जीने देते है ना मरने ,अपने से दूर ही रखो इन यादों के तीखेपन को, ज्यादा सुखी रहोगे .
    आंसुओं का नमक मीठेपन के अहसास को बढ़ा देता है ,ये नमक अंत तक काम आता है
    तुम्हारी इस रचना में तो हर कहीं है ,मुझे ये नमक पसंद है
    आंसुओं का नमक ..स्वादानुसार भी नही जरा कम कम ही….
    एहसास की खुशबू ना हो तो ना ये रेसिपी ना रिश्तों क़ी,ना दुनिया की .कोई भी रेसिपी मनमोहक हो ही नही सकती
    मिजाज़ का खट्टा… बिलकुल नही चलेगा,दांत खट्टे करने हैं क्या?
    वो तो….दुश्मनों के ,अपन तो ………
    हा हा हा
    अगली रेसिपी क्या बनाएंगी आप ?
    बधाई मेरे संजीव कपूर खाना खजाना

    अविनाश वाचस्‍पति said:
    फ़रवरी 1, 2010 को 9:03 अपराह्न

    हौसला
    हौस ला
    हौज ला
    लाने की जरूरत नहीं है
    ब्‍लॉगवाणी से जुडि़ए
    बैहोज ही सब कुछ
    भर जायेगा टिप्‍पणियों से।
    सुंदर है अच्‍छा है
    फासला का फालसा
    कब बनेगा/मिलेगा
    इंतजार है।

    समीर लाल said:
    फ़रवरी 3, 2010 को 7:19 पूर्वाह्न

    ये तो बड़ी स्वादिष्ट गज़ल बन गई..वाह!!

    बस, ऐसी ही रेसिपी पेश करते चलें. 🙂

    nirmla.kapila said:
    फ़रवरी 3, 2010 को 9:28 पूर्वाह्न

    दोबारा खाने आ गयी मैने भी आज यही डिश बनाई है देखियेगा मेरा ब्लाग स्वाद लगे तो बतायें मगर सास की डिश को बहु कहाँ सराहती है हा हा हा हा आशीर्वाद ।

    Lalta said:
    फ़रवरी 6, 2010 को 1:44 अपराह्न

    bahut hi achha hai, ek nasihat aur ek sawaal
    kaash samjhnewala ise samajh pata

    रवि कुमार, रावतभाटा said:
    फ़रवरी 15, 2010 को 6:45 अपराह्न

    केसरिया जज़्बात..?
    और चिंता ना करें. यह पकवान ठंड़ा होकर और ज़्यादा लज़ीज हो जाता है….

    हमें मिलन में होते हुए भी, विरह के भाव ही ज़्यादा क्यूं अकुलाते हैं..?

    बेहतर…

    न इश्क ही जीता और न दिल ही हारा
    वफ़ा की राह में मेरा हौसला ये कैसा है

    रवि said:
    फ़रवरी 16, 2010 को 4:14 अपराह्न

    बढ़िया व्यंजन. शानदार. मजेदार. 🙂

    bhaskar dhyani said:
    फ़रवरी 26, 2010 को 3:20 अपराह्न

    bahut chatpati ghazal thee. agar samajh aati to aur maza aata. Just joking. its indeed a very nice ghazal and not looking as if it is the first attempt. Keep writing. All the best

    alpana said:
    अप्रैल 12, 2010 को 8:11 अपराह्न

    bharvan gazal ke kya kahne! anand aa gya!

    —-
    Amrood ka ras pahali bar suna..kabhi dkehenge..bana kar.
    dhnywad.

    Manjul said:
    दिसम्बर 4, 2011 को 8:11 पूर्वाह्न

    yeh jajbaat ki gajal hai wah …wah

    kanchan said:
    जुलाई 30, 2013 को 11:44 पूर्वाह्न

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